Tuesday, June 28, 2011

Friday, June 24, 2011

फॉरवर्ड प्रेस : आइए, इसके नये कलेवर का स्‍वागत करें


फॉरवर्ड प्रेस : आइए, इसके नये कलेवर का स्‍वागत करें

21 JUNE 2011 12 COMMENTS

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♦ मुसाफिर बैठा
फारवर्ड प्रेस कई मायनों में अनूठी, तेजोदीप्‍त, बेबाक और क्रांतिकारी पत्रिका है। वैज्ञानिक और तार्किक सोच को बढ़ावा देने के उद्देश्‍य से निकाली गयी यह मासिक द्विभाषिक (हिंदी & अंग्रेजी) पत्रिका खास कर दलित और शूद्र समुदाय, जिन्हें हम बहुजन भी कह सकते हैं, के हितों को संबोधित प्रश्नों, वंचनाओं, अधिकारों, अस्मिताओं, आशा-आकांक्षाओं को लेकर बेहद संवेदनशील है। इस मिजाज की भारत की यह इकलौती वैचारिक पत्रिका है। यह पत्रिका मई 2009 से अस्तित्व मे आयी। पत्रिका के नाम के औचित्य पर बात करते हुए संपादक आइवन कोस्का कहते हैं, “…हम उत्तर भारत की पत्रकारिता की नयी दृष्टि लेकर आये हैं। इसे हम कहते हैं – फारवर्ड थिंकिंग अर्थात अगड़ी सोच। इससे हमारा अर्थ है कि हम भारत के सभी लोगों की प्रगति और विकास के लिए प्रतिबद्ध हैं – केवल आर्थिक नहीं बल्कि सभी पक्षों में।”
अंतर्राष्ट्रीय प्रसार की यह पत्रिका देश-परदेस के हर कोने में मौजूद बहुजन समाज के हक-हुकूक की निगहबानी को प्रस्तुत दिखती है। पत्रिका का फलक काफी व्यापक और विस्तृत है। इतिहास और वर्तमान के तमाम पहलुओं पर समाज की मुख्यधारा के नजरिये को बहुजन दृष्टि से वैज्ञानिक-तार्किक पड़ताल करते हुए बात और विमर्श आपको यहां बिलकुल संजीदा और सजीव तरीके से घटित होते हुए मिलेगा।
पत्रिका पिछले मई 2011 में दो साल की उम्र की हो गयी। हालांकि जो इसका मिजाज है, जो इसके तेवर हैं, उस हिसाब से यह अपने पाठक वर्ग के अभीष्ट हिंदी हिस्से में बहुत असरदार दखल नहीं बना पायी है। वैसे, इधर, हाल के दिनों में पत्रिका की रीति-नीति में कुछ बदलाव आये हैं, जिससे आशा की जा सकती है कि पत्रिका के हिंदी पाठक वर्ग के बीच भी प्रचार-प्रसार निकट भविष्य में बढ़ता दिखाई देगा, जबकि पहले यह अंग्रजी पाठक वर्ग के मध्य ही यह अधिक प्रचलित थी।
पत्रिका का संपादन इधर तेजतर्रार युवा साहित्यकार और विचारक प्रमोद रंजन के हाथों में सौंपा गया है। समृद्ध और नवोन्मेषी दृष्टि रखने वाले प्रमोद पत्रकारिता का व्यापक अनुभव रखते हैं। प्रमोद ने बिहार के मीडिया मिजाज पर पैनी दृष्टि रखते हुए कुछ साल पहले एक सर्वेक्षण प्रस्तुत करते हुए मीडिया के सवर्ण चरित्र और जनसरोकारों से बढती दूरी का खुलासा किया था। उन्होंने बिहार के कोशी क्षेत्र में कुछ साल पहले आयी भयंकर बाढ़ की त्रासदी, उस पर प्रशासन के उदासीन एवं शिथिल रवैये, चूक और लूट की पोल खोली थी। उनकी मेहनत और दृष्टि का असर यहां पत्रिका में भी दिखने लगा है।
जून 2011 अंक को बतौर बानगी देखा जा सकता है। ‘दिल्ली विश्वविद्यालय में सीटों की लूट’ नामक शोधपूर्ण और आंखखोलू रपट ओबीसी कोटे के छात्रों को उनको मिलने वाला कोटा न उपलब्ध करवा कर नामांकन से वंचित करने की अभी की ताजातरीन ‘वारदात’ से रूबरू करवाती है। इस रपट का नोटिस लेकर एक इलेक्ट्रौनिक चैनल ने भी समाचार चलाया। विश्वविद्यालय के इस द्वेष, ज्यादती और कपट-उद्भेदन से निहित स्वार्थी सवर्ण तत्व परेशान दिख रहे हैं। प्रमोद रंजन ने बिहार के समाज में व्याप्त सामाजिक भेदभाव, राजनीतिक प्रदूषण, अनगढ़ रुढ़‍ियों, चलनों आदि को भी पत्रिका का कंसर्न बनाना शुरू किया है। प्रगतिशील एवं विद्रोही तेवर के साहित्यकार एवं राजनीतिज्ञ प्रेमकुमार मणि का नियमित लेखन यहां देखना अतिरिक्त रूप से आह्लादक है। उनमें हमेशा नयी दृष्टि देखने को आपको मिलेगा जो बहुधा बहसतलब होती है।
मैं इस जरूरी पत्रिका के दीर्घ और क्रांतिधर्मी जीवन की कामना करता हूं।
(मुसाफिर बैठा। समालोचक-साहित्‍यकार। फेसबुक पर पाद टिप्‍पणियों के लिए इन दिनों चर्चा के केंद्र में। बिहार विधान परिषद की प्रकाशन शाखा में अधिकारी। अभी अभी एक कविता पुस्‍तक प्रकाशित हुई है, बीमार मानस का गेह। musafirbaitha68@yahoo.com पर संपर्क करें।


Wednesday, May 25, 2011

Premkumar mani , Manikant thakur, Nand kishor naval

निवार को को पटना के माध्यमिक शिक्षक संघ भवन में जेएनयू, दिल्ली ऑल इंडिया बैकवर्ड स्टुडेंट फोरम और अभियान, पटना के बैनर तले एक सेमिनार का आयोजन किया गया। बिहार के राजनीतिक संदर्भ में पत्रकारिता पर बात हुई। सबसे पहले अपनी बात रखते हुए मणिकांत ठाकुर ने कहा कि आज मीडिया के सामने दो बड़ी चुनौतीयां हैं। पहला ये सरकारी तंत्र का पब्लिक रिलेशन हाउस बनता जा रहा है, दूसरा आज का मीडिया हाउस पत्रकारों और संवदाताओं की मर्जी से नहीं बल्कि उनके मलिकों की मर्जी से चल रहा है। सरकार आज गिरोह बनती जा रही है, और वो सांस्‍थानिक तरीके भ्रष्‍टाचार को वैधता दे रही है और हैरानी की बात ये है कि मीडिया इन तमाम मसलों पर मौन है। पांच-सात सालों में जो विज्ञापनों की बाढ़ आयी है, इसने मीडिया का अपहरण कर लिया है।
दैनिक जागरण के संवाददाता राघवेंद्र दुबे ने कहा कि आज राजनीति और मीडिया दोनो कॉरपोरेट हो गयी है। अखबारों और किताबों में शब्दों की ताकत कम हुई है और विज्ञापनो में मजबूत। उन्‍होंने कहा कि वर्चुअल स्पेस, फेसबुक और ब्‍लॉग्‍स से इन बड़े घरानों वाले अखबारों को चुनौतियां मिल रहीं हैं।
पत्रकार दिलीप मंडल ने कहा कि बिहार में मौजूदा शासन में न तो कोई उद्योग लगा, न आपराधिक घटनाओं में कमी आयी, फिर भी यहां का मीडिया किस आधार पर सुशासन के गीत गा रहा है? दो-तीन अखबारों की पेज संख्‍या सात-आठ पर छपी रिपोर्टों का उदाहरण देते हुए उन्‍होंने कहा कि अगर इन रिपोर्ट्स को मैं पहले पन्‍ने पर छापने लगूं, तो दस दिन के अंदर यहां जंगल राज नजर आने लगेगा। 1974 में जेपी के समय जो मीडिया यहां था, वो अब यहां नहीं रहा। बिहार की कंबाइंड रीडरशिप (85 लाख) का हवाला देते हुए दिलीप मंडल ने कहा कि यहां के दो अखबारों को अगर कोई खरीद ले, तो वह यहां के मीडिया पर वर्चस्व कायम कर सकता है। यहां के मीडिया पर सवर्णों का पूरा अधिकार रहा है। मीडिया में जो न्यायप्रिय सवर्ण हैं, हम उनसे आशा कर सकते हैं। उन्‍होंने यह भी कहा कि कॉरपोरेट के पत्रकारों को कोसना जायज नहीं है, वे तो एक बड़ी मशीन के सिर्फ नट-बोल्ट हैं, जड़ तो कहीं और है।
जनसता से जुड़े वरिष्‍ठ पत्रकार गंगा प्रसाद ने अपनी बात रखते हुए कहा कि आज अखबार में समाचार तो है, पर खबर नहीं है। एक समय था, जब मीडिया हाउस इंदिरा के खिलाफ लिखते थे, लेकिन आज नीतीश से डरते हैं। आज हम पत्रकारिता नहीं बल्कि इसकी दुकानें चला रहे हैं, जिसमें तीन हजार, पांच हजार में पत्रकार खट रहे हैं।
वरिष्‍ठ पत्रकार सुकांत ने कहा कि आपलोग जिस समस्‍या की बात कर रहे हैं, वह पटना और दिल्‍ली की समस्‍या है। अखबारों के क्षेत्रीय संस्‍करणों में आज भी साहस के साथ सच की पत्रकारिता की जा रही है, लेकिन उनकी आवाज को आप सुनना नहीं चाहते और मीडिया विमर्श में सिर्फ राजधानियों को ही महत्‍व देते हैं।
कथाकार, राजनीतिज्ञ प्रेम कुमार मणि ने कहा कि सुशासन के साथ-साथ बिहार में पांखंड का राज भी चल रहा है। उन्‍होंने हिंदुस्‍तान से जुड़े व सांसद एनके सिंह के नीतीश के साथ रिश्ते का उदाहरण देते हुए कहा की बिहार का मीडिया आज नीतीश का मीडिया है, जो वेल मैनेज्‍ड है और वो सरकार की चापलूसी में लगा है। हमारी विडंबना है कि आज समाचार क्या होंगे, ये पहले राजनीति के संपादक तय करते है फिर अखबार के। सच्चाई लिख रहे कुछ लोगों पर एंटी नीतीश का आरोप लगाकर कुचला जा रहा हैं।
कार्यक्रम के अंत में प्रो नवल किशोर चौधरी ने कहा कि जो 15 सालों में डेमोक्रेटिक फ्युरलिज्‍म था, वो आज आगे वढ़ा है। एक ओर जहां 5.2 फीसदी ग्रोथ रेट को 11.6 फीसदी दिखाया जा रहा है, वहीं इंदिरा आवास मात्र 35 फीसदी, नरेगा 1.22 फीसदी समाजिक उद्देश्य को पूरा कर पाये हैं।
Development is where out of 5 years… नवल किशोर चौधरी ने कहा कि जातिवादिता अपने चरम पर है। अपराधिक घटनाओं की quantity में जहा बढ़ोत्तरी हुई है, वहीं quality में कमी आयी है। कानून-व्‍यवस्‍था में कुछ सुधार हुआ है। you have anything do you like… हमें बाजार बना दिया गया है। आज हमें सोशलिस्‍ट से कैपिटलिस्‍ट बनाया जा रहा है। ऐसे में मीडिया की भूमिका पर सवाल उठता है।
मंच संचालन सांस्‍कृतिक पत्रकार और रंगकर्मी अनीश अंकुर ने किया।

Sunday, March 07, 2010

मुजीब हुसेन

मुजीब हुसेन mujeeb husain
युवा चित्रकार मुजीब शिमला में रहते हैं। उन्‍होंने अनेक हिंदी लेखकों रेखाचित्र भी बनाये हैं। इनके बनाये कुछ चित्र इस ब्‍लॉग पर भी देखे जा सकते हैं। 

Mujeeb Husain
Born in 1979, Shimla, Himachal Pradesh, India
Living and working in Shimla (H.P.)
Mujeeb did his Master in Visual Arts (Drawing and Paiting), gold medalist in 2003. UGC NET qualified in 2006. He is also did his post graduation in English. Presently he is pursuing PhD in Visual Arts (Painting & Drawing). He got Rashtriya Gaurav Samman 2005. He awarded as best artist by International Art and Language Charu 2009. He paints in Acrylic/water/ oil & mix media on paper and canvas. He is also uses pencils, pen, and charcoal to make black & white drawing. His work is inspired from the nature as he is born and brought up in the lap of nature. His work is abstract, semiabstract. Inspired with the nature he has spread a massage of save environment through his paintings & pen drawings. Besides this he has worked for children in newspapers and his illustrations and articles also have been published in various newspapers. Presently he is working as a teacher of Art in St. Edwards School, Shimla, and Himachal Pradesh, India.



खिडकी

मुजीब हुसेन की पेंटिंग 

mujeeb husain.painting

शहर की ओर

मुजीब हुसेन की पेंटिंग 

mujeeb husain.painting


जख्‍मी

मुजीब हुसेन की पेंटिंग 

mujeeb husain.painting


उलझन

मुजीब हुसेन की पेंटिंग 

mujeeb husain.painting

उलझन

मुजीब हुसेन की पेंटिंग 

mujeeb husain.painting

आशियाना

मुजीब हुसेन की पेंटिंग 


mujeeb husain.painting

Wednesday, January 06, 2010

कर्पूरी ठाकुर


कर्पूरी ठाकुर

दिल्‍ली प्रकाशित 'शुक्रवार' के 8 जनवरी, 2009 अंक में प्रकाशित रईस अहमद लाली की रिपोर्ट -





कर्पूरी ठाकुर


कर्पूरी ठाकुर 


Karpoori Thakur, Karpuri Thakur

Wednesday, November 25, 2009

प्रभाष जोशी



प्रभाष जोशी की तस्वीरें

प्रभाष जोशी


प्रभाष जोशी की तस्वीरें

Monday, October 12, 2009

सुधीर चंद्र, प्रमोद रंजन व अपूर्वानंद


बाएं से- इतिहासकार सुधीर चंद्र (झुके हुए), प्रमोद रंजन (अपना पर्चा पढते हुए) व अपूर्वानंद

(यह तस्‍वीर शिमला एडवांस स्‍टडीज में 23 से 29 सितंबर, 2009 के दौरान 'हिदी की आधुनिकता : एक पुनर्विचार' विषय पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान ली गयी थी)


राजीव रंजन गिरी





(यह तस्‍वीर शिमला एडवांस स्‍टडीज में 23 से 29 सितंबर, 2009 के दौरान 'हिदी की आधुनिकता : एक पुनर्विचार' विषय पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान ली गयी थी)

बाएं से- आदित्‍य निगम, अभय कुमार दुबे व अजय नावरिया



(यह तस्‍वीर शिमला एडवांस स्‍टडीज में 23 से 29 सितंबर, 2009 के दौरान 'हिदी की आधुनिकता : एक पुनर्विचार' विषय पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान ली गयी थी)

अजय नावरिया, विमल थोरात


बाएं से- अजय नावरिया, विमल थोरात, पीछे- अनामिका

सेमिनार हॉल में राकेश कुमार सिंह, अभय कुमार दुबे, सुधीर चंद्र व आदित्‍य निगम


बाएं से- राकेश कुमार सिंह, अभ य कुमार दुबे, सुधीर चंद्र व आदित्‍य निगम


( यह तस्‍वीर शिमला एडवांस स्‍टडीज में 23 से 29 सितंबर, 2009 के दौरान 'हिदी की आधुनिकता : एक पुनर्विचार' विषय पर आयोजित कार्यक्रम के दौरान ली गयी थी)

विनीत व प्रमोद रंजन


विनीत व प्रमोद रंजन

( यह तस्‍वीर शिमला एडवांस स्‍टडीज में 'हिदी की आधुनिकता : एक पुनर्विचार' विषय पर आयोजित कार्यक्रम -23-29 सितंबर, 2009- के दौरान ली गयी थी)

भारतीय उच्‍च अध्‍ययन संस्‍थान, शिमला ( एडवांस स्‍टडी)

Sunday, March 08, 2009

Pash



From left to right-Waryam Sandhu, Amarjit Chandan, darshan Khatkar, Paash and Jaswant Khatkar. March 1974, Gandhi Ground Amritsar

http://paash.wordpress.com/

Thursday, October 16, 2008

रचानाएं आमंत्रित





Dear Mr. Ranjan,

I saw your Blog "छाया: Photogrphs of Hindi writers" while searching for pics of some of the Hindi writers. It's a great effort from your side. I would like to congratulate you for maintaining the site and trying your best to update the pictures of all the contributors of Hindi literature. It's pretty sad to see that still we find very less online information related to Hindi literature. Thank you once again.We are about to release the first issue of a Hindi magazine called "Argala" ( www.argala.org ). It will be online for first few months and later from January 2009 onwards we will go for print issue. I would be very glad if you could contribute something from your side. I have seen 20 young writers on your Blog if you could forward their email id or if you could forward this message to them, I would be very thankful to you because we are a bit lacking in contributions from young people and I am very much in favour of contributions from young people specially who are less than 30 years old or don't have any publication history. All other contributions are by invitation only. We welcome all kind of contribution related to Hindi literature such as, Kavita, Kahani, Lekh, Sameeksha or anything which suggest how to promote Hindi or Hindi literature. There is one column which is dedicated to Translated articles from other languages to Hindi.In the first issue of Argala some of the highlights are, Interview of India's biggest award in literature ie Sahitya Academy Award winner Amarkant, Interview of Dr. Soumyabrata Chowdhury, a famous theater director and writer, article of Late Acharya Ramchandra Shukla and a few contributions from some of the most famous personalities in this field - Dr. Varyam Singh, Dr. Ganga Prasad Vimal, Dr. Anand Kumar and Dr. Devendra Chowbey.Hoping to hear from you soon.

With regards,Ravindra Pushker\Member, Editorial BoardArgala-editor@argala.org

Friday, July 11, 2008

भूपेंद्र नाथ कौशिक "फ़िक्र"


भूपेंद्र नाथ कौशिक "फ़िक्र"

जन्म १९२५ नाहनप्रयाण- २००७ जबलपुर
इनका नाम है.. श्री भूपेंद्र नाथ कौशिक "फ़िक्र"
और थोडी बहुत जानकारी के लिए.. आप इस ब्लॉग को खोल सकते हैं..
http://bkaushikfikr.blogspot.com/

Friday, May 23, 2008

छायाचित्रों का आपका ब्लाग देखा। मुझे बेहद पसन्द आया। आप बड़ा काम कर रहे हैं। मेरे पास भी वास्तव में बहुत से दुर्लभ चित्र हैं। ज्ञानरंजन, दूधनाथ सिंह, त्रिलोचन, नागार्जुन, सोमदत्त, हरि भटनागर, गगन गिल, अमृता भारती, प्रभात मित्तल, अशोक अग्रवाल, सुदर्शन नारंग, हॄदयेश, सुधीर सक्सेना, लीलाधर मंडलोई, विजय वाते, बशीर बद्र, भारत यायावर आदि न जाने कितने ही लोगों के चित्र। मैं धीरे-धीरे कुछ चित्र आपको भेजना चाहूंगा। जिन कवि-लेखकों में आपकी रुचि हो, कृपया लिख दें, मैं भेज दूंगा। कविता और गद्य की दो वेबसाईटों का सम्पादन कर रहा हूँ । कृपया इन्हें देखें। आप[अके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।सादर अनिल जनविजय
aapke blog me tasviron ka achha chayan hai. dekh kar sukhad laga.badhai.
harani hai ki ek tasvir me mera nam aapne Kalpana de dia hai. ho sake to use sahi kar den.
aadar sahit
alpana mishra
dehradun